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यूपी में निवर्तमान प्रधानों को ही बनाया जाएगा प्रशासक, ओबीसी आरक्षण के लिए नया आयोग गठित

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माई पीडीए समाचार
द्वारा संपादित : KAJAL TIWARI | Tue, 26 May 2026 01:17 PM
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उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद गांवों के संचालन को लेकर अहम निर्णय लिया है। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव और नई पंचायतों के गठन तक गांवों की जिम्मेदारी अब सरकारी अधिकारियों के बजाय निवर्तमान प्रधानों को ही सौंपी जाएगी।


सरकारी आदेश के मुताबिक, निवर्तमान ग्राम प्रधानों को उनकी-अपनी पंचायतों का प्रशासक नियुक्त किया जाएगा। यह व्यवस्था अधिकतम छह महीने तक या नई पंचायतों के गठन तक लागू रहेगी। जिलाधिकारियों को अपने-अपने जिलों में प्रधानों को प्रशासक के रूप में नामित करने के लिए अधिकृत किया गया है।


हालांकि, प्रशासकों के अधिकार सीमित रहेंगे। वे गांव की सफाई, पेयजल आपूर्ति, स्ट्रीट लाइट मरम्मत और सरकारी योजनाओं की सामान्य निगरानी जैसे दैनिक कार्यों को ही देख सकेंगे। कोई नया नीतिगत या बड़ा वित्तीय फैसला लेने के लिए उन्हें जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से प्रस्ताव जिलाधिकारी को भेजना होगा। डीएम की लिखित मंजूरी के बाद ही आगे की कार्रवाई हो सकेगी।


पंचायत चुनाव से पहले ओबीसी आरक्षण का फॉर्मूला तय करने के लिए सरकार ने नया राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग भी गठित कर दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राम औतार सिंह को पांच सदस्यीय आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है। आयोग में रिटायर्ड अपर जिला जज बृजेश कुमार, संतोष कुमार विश्वकर्मा, रिटायर्ड आईएएस डॉ. अरविंद कुमार चौरसिया और एसपी सिंह को सदस्य शामिल किया गया है।


आयोग पंचायत स्तर पर ओबीसी समुदाय की सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक हिस्सेदारी का अध्ययन कर रिपोर्ट देगा। इसी के आधार पर चुनाव में सीटों का आरक्षण तय होगा। सरकार ने आयोग को छह महीने में काम पूरा करने को कहा है।  


राज्य में पहले से मौजूद पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में समाप्त हो चुका था, जिसे बाद में अक्टूबर 2026 तक बढ़ाया गया। लेकिन कानूनी प्रावधानों के अनुसार, ओबीसी आरक्षण निर्धारण के लिए समर्पित आयोग का होना जरूरी है, जिसके चलते यह नया आयोग बनाया गया है।

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