खोजें

सहेजे गए लेख

आपने अभी तक अपने बुकमार्क में कोई लेख नहीं जोड़ा है!

लेख ब्राउज़ करें
Newsletter image

न्यूज़लेटर की सदस्यता लें

नए पोस्ट, समाचार और सुझावों के बारे में सूचित होने के लिए 10k+ लोगों में शामिल हों।

चिंता न करें हम स्पैम नहीं करते!

GDPR अनुपालन

हम यह सुनिश्चित करने के लिए कुकीज़ का उपयोग करते हैं कि आपको हमारी वेबसाइट पर सबसे अच्छा अनुभव मिले। हमारी साइट का उपयोग जारी रखकर, आप हमारे कुकीज़ के उपयोग, गोपनीयता नीति, और सेवा की शर्तें को स्वीकार करते हैं।

विधान परिषद चुनाव के बाद फिर चर्चा में आया उपेंद्र कुशवाहा को सीट देने का वादा, दिलीप जायसवाल ने टाली जिम्मेदारी...

Logo
माई पीडीए समाचार
द्वारा संपादित : KAJAL TIWARI | Fri, 12 Jun 2026 11:46 AM
  • शेयर करें:

बिहार विधान परिषद की नौ सीटों पर हुए हालिया चुनाव के बाद गठबंधन में सीट बंटवारे का मुद्दा फिर गर्मा गया है। इस बार चर्चा के केंद्र में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा को सीट न मिलने का मामला है।


क्या कहा दिलीप जायसवाल ने  

भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल ने इस सवाल पर कहा कि वह अब प्रदेश अध्यक्ष नहीं हैं, इसलिए इस बारे में विस्तार से नहीं बता सकते। उन्होंने कहा कि केंद्रीय नेतृत्व, कुशवाहा की पार्टी और प्रदेश नेतृत्व के बीच क्या बात हुई है, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। जायसवाल ने सुझाव दिया कि इस बारे में वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी से बात करनी चाहिए।


आश्वासन और मौजूदा स्थिति  

राजनीतिक हलकों में लंबे समय से चर्चा रही है कि विधानसभा चुनाव के दौरान सीट बंटवारे की बातचीत में उपेंद्र कुशवाहा को भविष्य में विधान परिषद की एक सीट देने का आश्वासन मिला था। इसी आधार पर उन्होंने एनडीए के साथ अपनी भूमिका तय की थी। सरकार गठन के समय मंत्रिमंडल विस्तार में उनके बेटे को मंत्री भी बनाया गया। माना जा रहा था कि विधान परिषद सदस्यता मिलने के बाद मंत्री पद को लेकर संवैधानिक अड़चन नहीं रहेगी।


लेकिन नौ सीटों पर उम्मीदवारों के नाम तय होने पर कुशवाहा को कोई सीट नहीं मिली। इसके बाद भाजपा के पुराने वादे पर सवाल उठने लगे। विपक्ष ने भी इसे मुद्दा बनाया और विश्लेषक जानना चाहते हैं कि आखिर वह आश्वासन पूरा क्यों नहीं हो सका।


बदलती प्राथमिकताओं की ओर इशारा  

दिलीप जायसवाल ने कहा कि उस समय की परिस्थितियां अलग थीं और जो भी बात हुई थी वह संगठन और केंद्रीय नेतृत्व की सहमति से हुई थी। अब पार्टी का नेतृत्व बदल चुका है और फैसले वर्तमान नेतृत्व के हाथ में हैं।  


उनका बयान न तो पुराने वादे से इनकार करता है और न ही मौजूदा फैसले का बचाव करता है। इससे संकेत मिलता है कि भाजपा के भीतर समय के साथ राजनीतिक प्राथमिकताएं बदली हैं।


अब सवाल यह है कि क्या भाजपा आगे चलकर उपेंद्र कुशवाहा को किसी अन्य पद या अवसर के जरिए संतुष्ट करेगी, या यह मुद्दा विधानसभा चुनाव तक एनडीए के भीतर चर्चा का विषय बना रहेगा।

इस विषय से संबंधित: