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बिहार विधान परिषद चुनाव 2025: शिक्षक और स्नातक सीटों पर NDA vs महागठबंधन की साख दांव पर

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माई पीडीए समाचार
द्वारा संपादित : KAJAL TIWARI | Wed, 17 Jun 2026 09:36 AM
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बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले विधान परिषद की आठ सीटों का चुनाव सियासी माहौल गर्म कर रहा है। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की ये सीटें भले संख्या में कम हैं, लेकिन इनका नतीजा सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की पकड़ और संगठन क्षमता की परीक्षा लेगा।


हाल ही में विधान परिषद की 10 सीटों पर चुनाव हुए थे, लेकिन वहां सभी उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए गए थे। इस बार स्थिति अलग है। शिक्षक और स्नातक क्षेत्रों की आठ सीटों पर मुकाबला सीधा और दिलचस्प होने वाला है। मतदाता संख्या सीमित जरूर है, लेकिन उनका फैसला काफी सोच-समझकर लिया जाता है।


पटना स्नातक सीट पर सबकी नजर  

पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र सबसे अहम माना जा रहा है। जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार एक बार फिर मैदान में हैं। पिछली बार उन्होंने राजद समर्थित उम्मीदवार को हराया था। इस बार उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी आजाद गांधी भाजपा के साथ हैं। इससे जदयू का मनोबल बढ़ा है, लेकिन स्थानीय असंतोष और बागी उम्मीदवारों की चर्चा भी तेज है। विश्लेषकों का मानना है कि इस सीट का परिणाम भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी की रणनीति का भी संकेत देगा।


तिरहुत स्नातक सीट पर कड़ा मुकाबला  

तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में करीब 1.35 लाख मतदाता हैं। पिछली बार उपचुनाव में जदयू को झटका लगा था जब शिक्षक नेता बंशीधर बृजवासी निर्दलीय जीतकर आए थे। इस बार जदयू के अभिषेक झा फिर सक्रिय हैं और जीत का दावा कर रहे हैं। लेकिन यहां मुकाबला आसान नहीं माना जा रहा।


शिक्षक सीटों पर भी सरगर्मी  

पटना शिक्षक क्षेत्र से नवल किशोर यादव लगातार शिक्षकों के संपर्क में हैं। तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से वामपंथी नेता संजय कुमार सिंह तीसरी बार चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि शिक्षकों के हित में किए गए संघर्ष का फायदा उन्हें मिलेगा।


दरभंगा शिक्षक सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मोहन झा फिर से सक्रिय हैं। पिछली बार उन्होंने जदयू उम्मीदवार को हराया था, इसलिए इस बार भी मुकाबला कड़ा माना जा रहा है।


सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में उपचुनाव जीतने वाले आफाक अहमद अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं। दिवंगत शिक्षक नेता केदार पांडे की विरासत भी यहां असर रखती है। उनके बेटे आनंद पुष्कर के जदयू में शामिल होने से मुकाबला और रोचक हो गया है।


जीत का गणित अलग है  

इन सीटों पर जीत का समीकरण आम चुनावों से अलग होता है। चार स्नातक सीटों पर करीब 4.85 लाख मतदाता हैं, जबकि चार शिक्षक सीटों पर सिर्फ 45 हजार मतदाता। ऐसे में जनसभाओं से ज्यादा अहम व्यक्तिगत संपर्क और मतदाताओं को बूथ तक लाने की रणनीति होती है।


राजनीतिक जानकारों के मुताबिक शिक्षक और स्नातक मतदाता लहर या भावनात्मक मुद्दों से ज्यादा उम्मीदवार की उपलब्धियों और शिक्षक हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को देखते हैं। इसलिए इन सीटों पर जीत प्रतिष्ठा का सवाल बन जाती है।


NDA और महागठबंधन दोनों ने झोंकी ताकत  

75 सदस्यीय विधान परिषद में फिलहाल एनडीए की स्थिति मजबूत है। भाजपा और जदयू गठबंधन बढ़त बनाए हुए है। वहीं राजद, कांग्रेस और वाम दलों का महागठबंधन अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश में है। हाल के उपचुनावों में विपक्ष को कुछ सफलता मिली है, जिससे उसका हौसला बढ़ा है।


एनडीए सभी आठ सीटों पर जीत का दावा कर रहा है। महागठबंधन का कहना है कि शिक्षकों और स्नातकों में सरकार के प्रति नाराजगी है, जिसका फायदा उन्हें मिलेगा। 


नवंबर तक चलने वाली यह लड़ाई सिर्फ आठ सीटों की नहीं है। यह तय करेगी कि बिहार के शिक्षित वर्ग और शिक्षक समुदाय की नब्ज पर किस गठबंधन की पकड़ मजबूत है।

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